गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

सवाल आत्महत्या का नहीं, सवाल यह है कि जांच का परिणाम कब आयेगा हुजूर ?

सवाल आत्महत्या का नहीं, सवाल यह है कि जांच का परिणाम कब आयेगा हुजूर ?

पिछले कुछ दिनों में छत्तीसगढ़ के दो प्रमुख संभाग मुख्यालयों में जो कुछ भी हुआ है। वास्तव में उसकी वास्तवीक जानकारी मुझे नहीं है। किन्तु जो कुछ भी हुआ, वह ठीक नहीं हुआ। इन दिनांे समाचार चैनलों व पत्रों में दो बातें प्रमुखता से आ रही हैं, एक तो सीएसपी देवनारायण पटेल द्वारा आत्महत्या और दूसरा सूरजपुर के विश्रामपुर में अपर कलेक्टर के साथ मारपीट। इन दिनों दोनों ही मामले समाचार पत्रों की सुर्खियां बनी हुई है। सीएसपी देवनारायण द्वारा आत्महत्या करना और परिवार को मारना बड़ी बात शायद नहीं हो सकती। किन्तु सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस बार भी आत्महत्या करने वाले ने एक न्यायायिक अधिकारी को शराबी कह कर पुकारा, उसने अपने सुसाइड नोट में शराबी जज का जिक्र किया। शायद आप सभी के जेहन में यह बात भी होगा कि इससे पूर्व बिलासपुर के एसपी राहुल शर्मा ने भी अपने आत्महत्या के सुसाइड नोट में एक न्यायायिक अधिकारी का ही जिक्र किया था। बिलासपुर के एसपी के आत्हत्या की गुत्थी अभी तक देष की बड़ी जांच एजेंसी नहीं सुलझा सकी है और अब इस दूसरे मामले को भी इसी को एजेंसी को देने की पहल की जा रही है। क्या कभी दोषी अफसर या फिर न्यायायिक सेवा से जुडे़ एरोगेट जज और शराबी जज ़ेइस मामले में दोषी पाये जायेंगे या फिर कुछ दिनों के बाद स्वयं ही ये सारे फाईल बंद हो जायेंगे।
अब सवाल यह है कि दोनों ही पुलिस अधिकारी उन नक्सल क्षेत्रों में रहे हैं, जहां पर पुलिस व सरकार का आमजन से वास्ता कम है किन्तु माओवाद वहां की गली-गली में बसा हुआ है। ऐसे क्षेत्रों में रहकर बखुबी नक्सलियों से लोहा लेने वाले इन पुरस्कृत अधिकारियों ने आत्महत्या को ही क्यों चुना ? क्या वास्तव में पुलिस विभाग में उच्च अधिकारियों और न्यायायिक अधिकारियों का दखल इतना ज्यादा है कि एक जिम्मेदार व जाबांज अफसर को उस जिल्लत से ज्यादा आत्महत्या भरा कदम उठाना ठीक लगा।

दूसरी घटना अविभाजित सरगुजा के विश्रामपुर की है जहां पर सड़क पर हुए एक दुर्घटना के बाद एक अपर कलेक्टर व पूर्व उपसरपंच व उसके गुर्गे आपस में उलझ गये और मामला मारपीट तक जाकर थमा।  पूर्व उपसरपंच व उनके गुर्गों ने अपर कलेक्टर से बदसुलुकी करते हुए मारपीट की ऐसी घटना सामने आयी और दूसरे दिन समुचा सूरजपुर जिले का प्रषासनिक अमला सड़क पर था, मांग थी मारपीट करने वालों की तत्वरित गिरफतारी और कार्यवाही। समूचे जिले में जिला मुख्यालय से लेकर ब्लॉक मुख्यालय तक प्रषासनिक अमला हड़ताल करने सड़क पर उतर चुका था, दूसरे दिन भी यहीं हुआ। पुलिस पर जल्द कार्यवाही करने दबाव बनाये गयें। प्रषासन अमले कुम्भकर्णी निंद सोया एक खेमा ऐसा भी था जो कि इस मामले के सामने आने के बाद आरोपी पूर्व उप सरपंच के घर-जमीन, दूकान सभी का निरिक्षण कर यह जांच कर रहा था कि कौन-कौन से सरकारी कब्जे में है कौन वैध है और कौन अवैध, जांच करके कार्यवाही भी की जा रही थी। लेकिन कार्यवाही करने वाले यहीं अधिकारी इस घटना से पहले रिष्वत की आगोष में कुम्भकर्णी निंद सो रहे थे और यह अतिक्रमण इनकी नज़रों के पास होते हुए भी काफी दूर था।

कार्यवाही की तत्परता आखिर क्यों ? - 
दोनों ही घटनाओं में कार्यवाही की जो तत्परता रही, उससे एक बात तो स्पष्ट हो जाता है कि पुलिसा व प्रषासन के उच्च अधिकारी आम जनता के मामलों में इतनी जल्दी कार्यवाही करने से बचती है, उसे बार-बार दौड़ाती है और तब तक दौड़ाती है जब तक की आवेदक थक कर यह न कह दें कि साहब यदि कुछ चाहिए तो बताईये, मेरा काम तो कर दीजिए। 
         जगदलपुर में न्यायधिष महोदय को तुरंत संबंधित अधिकारी पर कार्यवाही चाहिए थी, क्यों कि उनके साथ पूरा न्याय तंत्र था, जिसमें वकीलों से लेकर न्यायधिषों ने अपनी कार्यवाही रोक दी और हड़ताल पर चले आये। दबाव में पुलिस के उच्च अधिकारी ने सीएसपी का पक्ष जाने बिना कार्यवाही की, जिससे अपनी बदनामी को लेकर सीएसपी ने आत्महत्या कर ली।
लेकिन मेरा सवाल है उस न्याय व्यवस्था से जो कि छोटी-छोटी मामलों पर हमेषा डेट पर डेट देती है क्या वो किसी भी मामले का निदान एक या दो डेट में ही कर देगी या फिर न्याय व्यवस्था से जुड़े लोग केवल अपने लिये त्वरित कार्यवाही चाहते हैं और आमजनता को बार-बार दौड़ाना उनका पेषा है।
दूसरा सवाल है मेरा सूरजपुर जिले के उन प्रषासनिक अधिकारियों और कर्मचारियों से जो कि तुरंत ही गिरफतारी की मांग कर रही थी, कि क्या कभी आपने बिना रिष्वत के कोई काम किया है? क्या कभी जनता बार-बार आपके दर पर अपने कार्य करवाने घुमती है तो आप उसका तुरंत निदान बिना रिष्वत के करते हैं। खासकर वे पटवारी और तहसीलदार जो इस घटना के बाद बहुत आगे बढ़े थे, क्या कभी बिना रिष्वत के आपने किसी के जमीन का सिमांकन किया, नपाई की, निवास-जाति और आय के प्रमाण पत्र बनाने व उसके फार्म पर हस्ताक्षर के नाम पर आप तब तक लोगों को घुमाते हैं, जब तक उस हस्ताक्षर के लिये आने वाला व्यक्ति आपको रिष्वत ना दे दें। लेकिन आपके साथ एक घटना क्या घटा आप तो सड़क पर उतर आये, जनहित की आपने परवाह ही नहीं कि, जैसे आप आमजनों को बोलते है सिस्टम व नियम के हिसाब से कार्य हो रहा है या होगा, वैसे ही आपने भी इस घटना पर कार्यवाही के लिये सिस्टम व नियम का इंतजार क्यों नहीं किया। जब पुलिस चाहती कार्य करती अन्यथा जैसे और मामले लंबित होते हैं आपका भी मामला लंबित रहता। आप सिस्टम व नियम से आगे या उपर तो नहीं है, आप भी इसी के अनुसार चलने वाले लोग हैं, फिर न्याय व कार्यवाही के लिये इतनी तत्परता क्यों ?

अंतिम में एक बार फिर मैं यह दुहरा रहा हूं कि इन दोनों ही घटनाओं में जो कुछ भी हुआ चाहे व सीएसपी के सुसाइड नोट के अनुसार शराबी जज पर कार्यवाही हो या फिर अपर कलेक्टर के साथ मारपीट ये घटनायंे नहीं होने चाहिए। किन्तु ध्यान इस बात का भी रखना जरूरी है कि वास्त
व में उच्च पद पर आसिन व्यक्ति पद के अनुसार आचरण कर रहा है या फिर नहीं।